समिति
Posted on December 2nd, 2011 in No Comments »
![]() |
राष्ट्रभाषा प्रचार समितिहिन्दी नगर, वर्धा – ४४२००३ |
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना सन् 1936 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने एक स्वयं संचालित राष्ट्रभाषा संस्था के रूप में की थी। वर्तमान में इस बहुद्देशीय संस्था में 22 प्रांतीय समितियाँ (क्षेत्रीय केंद्र) 987 शिक्षा केंद्र (अध्ययन केंद्र) और 7629 परीक्षा केंद्र है। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का मुख्यालय वर्धा में स्थित है, जिसका प्रमुख उद्देश्य “एक दिव्य हो भारत जननी” के ध्येय के साथ संपूर्ण देशभर में हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी में गुणवत्ता शिक्षा को प्रस्तावित कर समाज में आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उत्थान करना है राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मुख्य संस्थापक डाँ राजेन्द्र प्रसाद, पं. जवाहरलाल नेहरू , नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, जमनालाल बजाज, चक्रवर्ति राजगोपालाचारी, राजर्षि पुरूषोत्तम टंडन, आचार्य काकासाहेब कालेलकर, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, आचार्य नरेन्द्र देव आदि थे। उस समिति का कार्यक्षेत्र प्रमुख रूप से गुजरात, महाराष्ट्र , मुम्बई, विदर्भ, मराठवाडा , मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली, असम, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, मिजारम, मणिपुर , त्रिपुरा, सिक्किम, बंगाल, उत्कल, जम्मु-कश्मीर, अन्दमान-निकोबार, गोवा, बेbगांव, हरियाणा आदि प्रदेश। उसी तरह विदेश में जैसे दक्षिण अफ्रीका, पूर्व अफ्रीका, अमेरिका, सुरीनाम, अरब, सुदान, इटली, मॉरिशस, जपान, म्यॉमा (बर्मा), नीदरलैण्ड, फीजी द्वीप, युनाइटेड किंग्डम, जर्मनी, थाईलैण्ड, बेहरीन, मस्कत, जावा, श्रीलंका आदि भी है।
विश्वभर हिन्दी का प्रचार एवं प्रसार हो इस लक्ष्य के साथ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति एक स्वंय संचालित संस्था के रूप में प्रतिस्थापित हुई, जिसका नाम ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ज्ञान मंडल’ है। इस मंडल द्वारा दूररवर्त शिक्षा के अन्तर्गत विभिन्न शैक्षिक कार्यक्रम को प्रस्तावित करता है।
एक राष्ट्र और एक राष्ट्रभाषा का पवित्र संकल्प लेकर गाँधीजी ने इस समिति की प्राण प्रतिष्ठा की और उनकी परिकल्पनाओं को मूर्त रूप देने में डाँ राजेन्द्र प्रसाद, पं. जवाहरलाल नेहरू , नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, जमनालाल बजाज, चक्रवर्ति राजगोपालाचारी, राजर्षि पुरूषोत्तम टंडन, आचार्य काकासाहेब कालेलकर, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, आचार्य नरेन्द्र देव आदि महापुरुषों ने जो अथक परिश्रम किया , वह इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है।
उद्देश्य तथा प्रवृत्तियाँ :
1. संपूर्ण भारत में , आवश्यकतानुसार विदेश में राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार – प्रसार करना और देशव्यापी व्यहवारों और कार्यों के लिए सुविधा प्रदान करना. राष्ट्रभाषा की परीक्षाओं का संचालन. पाठ्यपुस्तकें आदि का निर्माण व प्रकाशन. भावत्मक एकता के लिए भाषाई सहयोग द्वारा अनुकूल वातावरण तैयार कर भारतीय भाषाओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना।
2. भारतीय संविधान की धारा ३४३ और ३५१ के अनुसार भारत गणराज्य द्वारा स्वीकृत राष्ट्रलिपि देवनागरी में लिखी जानेवाली राष्ट्रभाषा हिन्दी का संपूर्ण भारत में प्रचार प्रसार तथा विकास करना और देशव्यापी व्यवहार और कार्यों के लिए सुविधा प्रदान करना।
3. हिन्दी भाषा एवं साहित्या की अभिवृद्धि के लिए उपयोगी पुस्तकें लिखवाना, अनुवाद करना और उन्हें प्रकाशित करना।
4. राष्ट्रभाषा हिन्दी की शिक्षा का प्रबंध करना तथा परीक्षाएँ चलाना।
5. हिन्दी प्रचारकों, केन्द्र व्यवस्थापकों तथा हिन्दी प्रेमियों को राष्ट्रभाषा प्रचार की गतिविधियों की जानकारी देने के लिए मासिक पत्रिका का प्रकाशन करना।
6. भारतीय संविधान की धारा ३५१ के अनुसार भारत की सामासिक संस्कृति की वाहक राष्ट्रभाषा को संस्कृत तथा भारत की अन्य समृद्ध भाषाओं के सहयोग से इसकी शब्दसमृद्धि करते हुए भारत की राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के लिए प्राणवान भाषा बनाना।
7. हिन्दी साहित्य तथा ज्ञान विज्ञान की अभिवृद्धि के लिए उपयोगी मौलिक पुस्तकें लिखवाना तथा अन्य भारतीय भाषा के उत्कृष्ट साहित्य का हिन्दी में अनुवाद करना तथा उसे प्रकाशित करना।
8. देवनागरी लिपि का प्रचार करना और टंकण, कंप्यूटर तथा शीघ्रलिपि के प्रशिक्षण और प्रसार के लिए आवश्यक कार्य करना।
समिति का कार्यक्षेत्र प्रमुख रूप से गुजरात, महाराष्ट्र , मुम्बई, विदर्भ, मराठवाडा , मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड, राजस्थान, दिल्ली, असम, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, मिजारम, मणिपुर , त्रिपुरा, सिक्किम, बंगाल, उत्कल, जम्मु-कश्मीर, अन्दमान-निकोबार, गोवा, हरियाणा आदि प्रदेश। उसी तरह विदेश में जैसे दक्षिण अफ्रीका, पूर्व अफ्रीका, अमेरिका, सुरीनाम, अरब, सुदान, इटली, मॉरिशस, जपान, म्यॉमा (बर्मा), नीदरलैण्ड, फीजी द्वीप, युनाइटेड किंग्डम, जर्मनी, थाईलैण्ड, बेहरीन, मस्कत, जावा, श्रीलंका आदि भी है।
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के वर्तमान पदाधिकारी
न्यायमूर्ति चंद्रशेखर धर्माधिकारी , अध्यक्ष
श्री विभूति मिश्र , उपाध्यक्ष
प्रा. अनंतरम त्रिपाठी, प्रधानमंत्री
श्री नवरतन नाहर, कोषाध्यक्ष
श्री कैलाश चंद्र पंत , सहायक मंत्री
डॉ. हेमचंद्र वैद्य, प्रचार मंत्री
श्री प्रकाश बाभले, परीक्षा मंत्री
प्रकाशन
स्थापना के दिन से आज तक समिति की विभिन्न परीक्षाओं की पुस्तकें, सहायक पुस्तकें तथा अन्य हिन्दी से संबंधित पुस्तकें समिति द्वारा समय समय पर प्रकाशित की जाती है।
भारत भारती पुस्तक माला
राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार संपूर्ण भारत में होना तो आवश्यक है ही, ताकि प्रत्येक भारतीय दूसरे प्रदेशों के निवासियों के साथ संपर्क स्थापित कर सकें तथा एक दूसरे के साथ सामान्य व्यवहार कर सकें। भाषा व्यवहार सरल होना भी आवश्यक है, अपितु हर प्रदेश के नागरिक दूसरे प्रदेश की भाषाओं का भी ज्ञान प्राप्त कर लें। भारतीय भाषा में शब्द साम्य बहुत बड़ी मात्रा में है। इस लिए इन भाषाओं का सीखना उतना कठिन नहीं है, किंतु दूसरे प्रदेश की भाषा सीखने में लिपि की भिन्नता एक बड़ी बाधा है।
समिति ने चाहा कि भारत का प्रत्येक व्यक्ति दूसरे प्रदेश की भाषाओं से परिचित हों. इसी उद्देश्य से समिति ने भारत भारती नामक तेरह भाषाओं की तेरह छोटी – छोटी पुस्तकें प्रकाशित की है। सभी भाषाओं को देवनागरी में प्रस्तुत किया गया है। इन पुस्तकों के द्वारा इन तेरह भाषाओं में से किसी भी भाषा का सामान्य ज्ञान आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तथा सामान्य व्यवहार की कठिनाई दूर हो सकती है। इसि तरह कवि श्री माला भी विशेष उल्लेखनीय है।
.
राष्ट्रभाषा पत्रिका:
जुलाई १९४३ में राष्ट्रभाषा के प्रचार कार्य को गति देने तथा प्रचारकों से निरंतर संपर्क बनाए रखने के लिए “राष्ट्रभाषा” पत्रिका निकली और उसे नियमित रूप से प्रकाशित किया जाने लगा। सन १९४२-४३ में स्वतंत्रता आंदोलन के कारण देश में उथल- पुथल के दिन थे। समाचार पत्र के प्रकाशन में विभिन्न प्रकार की कठिनाईयाँ आ रही थीं, जिसमें कागज की कमी सबसे अधिक थी. सभी कठिनाई पार करते हुए इस पत्रिका का प्रकाशन जारी है.
विस्तृत जानकारी के लिये : —-
